”श्रीमद्भगवत् गीता”
श्रीमद्भागवत गीता (संक्षिप्त में गीता) सनातन धर्म का सबसे प्रमुख और पूजनीय पवित्र ग्रंथ है。यह ग्रंथ महाभारत के युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण और पांडव राजकुमार अर्जुन के बीच हुए संवाद के रूप में है इसमें जीवन जीने की कला, कर्म का सिद्धांत और अध्यात्म का सार बताया गया है
गीता से जुड़ी कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
- पृष्ठभूमि: जब महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था, तब अर्जुन अपने सगे-संबंधियों को युद्ध के मैदान में देखकर मोहग्रस्त और निराश हो गए थे。तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, मृत्यु, धर्म और कर्तव्य का परम ज्ञान दिया था。
- श्लोक और अध्याय: इस ग्रंथ में कुल 700 श्लोक हैं, जिन्हें 18 अध्यायों में विभाजित किया गया है。
- मुख्य योग: गीता में मुख्य रूप से तीन मार्गों (योगों) का वर्णन किया गया है:
- कर्म योग: बिना फल की चिंता किए अपने कर्तव्य (कर्म) का पालन करना
- भक्ति योग: ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम
- ज्ञान योग: सत्य, आत्मा और परमात्मा के विवेक को समझना
गीता मात्र एक धार्मिक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह एक जीवन प्रबंधन का शास्त्र है जो मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में सही निर्णय लेने और शांति प्राप्त करने की प्रेरणा देता है
भगवद् गीता को हमेशा एक मार्गदर्शक के रूप में पढ़ें, न कि केवल एक धार्मिक पुस्तक के तौर पर। इसे समझने के लिए प्रामाणिक टीका (टीका/व्याख्या) चुनें, श्लोकों के अर्थ और उनके जीवन-मूल्यों पर गहराई से विचार करें, और सबसे महत्वपूर्ण बात—अपने दैनिक जीवन में इसके सिद्धांतों को लागू करें
श्रीमद्भगवद्गीता में 18 अध्याय हैं, जो जीवन जीने की कला, कर्म, ज्ञान, और भक्ति का मार्ग दिखाते हैं। गीता की 18 मुख्य बातें (शिक्षाएं) इस प्रकार हैं :
- कर्म का अधिकार: आपका केवल कर्म करने पर अधिकार है, फल पर नहीं। इसलिए फल की चिंता किए बिना अपना कर्तव्य निभाएं।
- संदेह का नाश: संदेह करने वाले का विनाश निश्चित है। ज्ञान के जरिए अपने संशय (डाउट) को मिटाएं।
- समत्व का भाव: सुख-दुख, लाभ-हानि और जीत-हार को समान समझकर मन को शांत रखें।
- आत्मा अमर है: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है।
- स्वधर्म का पालन: किसी और का काम पूर्णता से करने से बेहतर है कि आप अपना काम करें, भले ही उसमें कुछ कमियां हों।
- क्रोध का त्याग: क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नष्ट होने से व्यक्ति का पतन हो जाता है।
- भक्ति और समर्पण: जो मनुष्य अपना सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर देता है, उसे परम शांति मिलती है।
- योग और संयम: संतुलित आहार और सही दिनचर्या अपनाने से ही योग सिद्ध होता है और दुखों का नाश होता है।
- ज्ञान की महिमा: इस दुनिया में ज्ञान के समान पवित्र और शुद्ध करने वाली कोई दूसरी चीज़ नहीं है।
- परमात्मा का विस्तार: सूर्य का प्रकाश, चंद्रमा की चांदनी और सब जीवों की शक्ति भगवान का ही स्वरूप हैं।
- ईश्वर का विराट रूप: हर जीव में ईश्वर मौजूद है। सृष्टि का निर्माण और विनाश सब परमात्मा के हाथों में ही है।
- सच्चा भक्त: जो किसी से द्वेष नहीं करता, जो सब जीवों के प्रति दयालु है, वही ईश्वर का प्रिय भक्त है।
- शरीर और आत्मा का ज्ञान: हमारा शरीर एक ‘क्षेत्र’ है और इसे जानने वाली आत्मा या चेतना ‘क्षेत्रज्ञ’ है।
- तीन गुण: मनुष्य सतोगुण (ज्ञान/शांति), रजोगुण (कर्म/लालच), और तमोगुण (अज्ञान/आलस) से बंधा होता है।
- पुरुषोत्तम (परमेश्वर): इस संसार रूपी उल्टे पीपल के पेड़ की जड़ें ऊपर (ईश्वर) और शाखाएं नीचे हैं। जो इसे समझता है, वह ज्ञानी है।
- दैवी और आसुरी स्वभाव: सच, अहिंसा और दान दैवी गुण हैं, जबकि अहंकार, क्रोध और कठोर वचन आसुरी (राक्षसी) स्वभाव हैं।
- श्रद्धा के प्रकार: व्यक्ति की आस्था (श्रद्धा) सात्विक, राजसिक या तामसिक हो सकती है, जैसी जिसकी श्रद्धा, वैसा ही उसका जीवन होता है।
- शरणागति ही परम धर्म: सब धर्मों का त्याग करके केवल ईश्वर की शरण में आएं, प्रभु सभी पापों से मुक्त कर देंगे ।
