सौरभ राजपूत हत्याकांड (नीले-ड्रम केस) में मुस्कान-साहिल को सजा-ए-मौत…
मेरठ के बहुचर्चित नीले ड्रम हत्याकांड में अदालत ने बुधवार को मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई है।मेरठ की दहला देने वाली उस काली रात की खौफनाक यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं, जब क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए एक हंसता-खेलता परिवार उजड़ गया था।मर्चेंट नेवी कर्मी सौरभ राजपूत की हत्या कर जिस तरह उनके शरीर के टुकड़े कर नीले ड्रम में सीमेंट से सील किए गए थे, उसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया था। इस बहुचर्चित और वीभत्स हत्याकांड में अदालत का अंतिम फैसला आ चुका है, जहां जिला जज ने दोषी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई है।इस मामले में अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता और क्रूरता का हवाला देते हुए दोनों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी। दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने मुस्कान की दो बेटियों के भविष्य और परवरिश का हवाला देकर अदालत से नरमी बरतने की अपील की थी।
अदालत का फैसला सुनते ही मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला भावुक हो गए। जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत में बुधवार को सजा पर सुनवाई की। वहीं मुस्कान ने कहा कि उसकी दो बेटियां है उनका ख्याल रखा जाए। जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए दोनों दोषियों से अदालत ने पूछा कि क्या वे सजा सुनाए जाने से पहले कुछ कहना चाहते हैं। दोनों ने जवाब दिया कि उन्हें कुछ नहीं कहना है। लंच के बाद दोनों को दोबारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया गया। जब अदालत ने मुस्कान की आंखों में आंखें डालकर सीधा सवाल दागा-‘तुम अपने पति की हत्या की दोषी साबित हो चुकी हो, अपने लिए क्या सजा चाहती हो?’ मुस्कान ने कहा-‘मेरी दोनों बेटियां बहुत छोटी हैं, उनका ख्याल रखा जाए… मुझे कम से कम सजा दी जाए।’जब अदालत ने उसके हमदर्द और जुर्म के साझीदार साहिल से पूछा, तो उस खूंखार आशिक की हेकड़ी भी पूरी तरह हवा हो चुकी थी। साहिल ने भी कांपती आवाज में सिर्फ इतना ही कहा-‘साहब, कम से कम सजा दीजिए।’ इसके बाद अदालत ने दोनों को मृत्युदंड की सजा सुनाई।जेल प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, फैसला सुनते समय मुस्कान ने हाथ जोड़ रखे थे और बाद में रोने लगी। साहिल शुक्ला की आंखें भी नम हो गईं। कुछ देर बाद दोनों फूट फूटकर रोए, जिसके बाद उन्हें बैरकों में ले जाया गया।
कानूनी रूप से यह समझना बेहद जरूरी है कि निचली अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाए जाने का मतलब यह कतई नहीं होता कि दोषियों को तुरंत फंदे पर लटका दिया जाएगा। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के नियमों के अनुसार, जब भी कोई जिला या सत्र न्यायालय किसी आरोपी को मौत की सजा सुनाता है, तो वह फैसला अपने आप अंतिम नहीं होता। इसके लिए नियम यह है कि सेशन कोर्ट को अपने इस पूरे फैसले और मामले के तमाम दस्तावेजों को अनिवार्य रूप से संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास भेजना होता है। जब तक उच्च न्यायालय इस सजा की पुष्टि नहीं कर देता, तब तक यह आदेश अमल में नहीं लाया जा सकता।जिला अदालत के इस फैसले के खिलाफ दोषी मुस्कान और साहिल के पास यह पूरा कानूनी हक सुरक्षित है कि वे इलाहाबाद हाईकोर्ट में सजा और दोषसिद्धि को चुनौती दे सकें।उच्च न्यायालय के पास यह पूरी ताकत होती है कि वह चाहे तो निचली अदालत के फांसी के इस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर सकता है, सजा को उम्रकैद में बदल सकता है या फिर दोषियों को सबूतों के अभाव में बरी भी कर सकता है।
अगर इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी मुस्कान और साहिल की अपील खारिज हो जाती है और अदालत निचली अदालत की फांसी की सजा को सही ठहराते हुए बरकरार रखती है, तो भी कानूनी रास्ते यहीं खत्म नहीं होते। इसके बाद दोनों दोषियों के पास देश की सर्वोच्च अदालत में जाने का रास्ता खुला रहता है।जब अदालतों के सभी दरवाजे पूरी तरह बंद हो जाएं और हर जगह से सजा पर मुहर लग जाए, तब संविधान के तहत आखिरी उम्मीद का रास्ता बचता है। दोनों दोषी देश के राष्ट्रपति के समक्ष अनुच्छेद 72 के तहत अपनी दया याचिका दाखिल कर सकते हैं। भारत के राष्ट्रपति के पास यह असीम संवैधानिक अधिकार होता है कि वे किसी भी अपराधी की मौत की सजा को पूरी तरह से माफ कर सकते हैं या फिर उसे उम्रकैद की सजा में बदल सकते हैं।राष्ट्रपति का यह फैसला पूरी तरह से केंद्र सरकार की सिफारिश और मानवीय पहलुओं पर आधारित होता है।
