27 सितंबर से शुरू होगा पितृ पक्ष…
हिंदू धर्म में पितृ पक्ष (Pitru Paksha 2026) का अत्यंत आध्यात्मिक महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार, श्राद्ध पक्ष अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होती है और ठीक 15 दिन के बाद अमावस्या तिथि पर समाप्त होती है।इस दौरान लोग दिवंगत पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से पितरों का तर्पण करने से परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। इस वर्ष पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर रविवार से होगी और 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या रहेगी।
मान्यताओं के मुताबिक, पितृ पक्ष के दौरान पितरों की आत्माएं पृथ्वी पर किसी न किसी रूप में आती है। इसलिए उनके प्रति श्रद्धा, सेवा और समर्पण जाहिर करने के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठानों का पालन किया जाता है। इन धार्मिक अनुष्ठानों से पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है और परिवार में सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद बना रहता है।ऐसा भी माना जाता है कि, इन अनुष्ठानों से दीर्घायु, धन, ज्ञान, संतान प्राप्ति का सुख और जीवन में समग्र समृद्धि प्राप्त होती है। इसके अलावा व्यक्ति को मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतुलन प्राप्त होता है।
पितृ पक्ष में श्रद्धालु सुबह स्नान कर तिल और जल से पितरों का तर्पण करते हैं। जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि को उनका श्राद्ध करने की परंपरा है। इसमें माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, भाई और अन्य दिवंगत परिजनों का स्मरण किया जाता है। पिंडदान के बाद ब्राह्मणों, परिवार और इष्ट-मित्रों को भोजन कराने तथा दान-पुण्य की भी परंपरा है। श्री महामाया मंदिर के पुजारी भगवताचार्य पंडित राकेश शर्मा (कोपरा) ने बताया कि पितृ ऋण से मुक्ति के लिए पितरों की विधिवत पूजा-अर्चना करनी चाहिए। पितृ पक्ष में श्रद्धा के साथ पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य करने की परंपरा है।
पितृ पक्ष के दौरान कुछ विशेष तिथि को विशेष श्रद्धा का विधान है:- प्रतिपदा: नाना-नानी के श्राद्ध के लिए यह तिथि विशेष मानी जाती है,यदि उनके घर में कोई और न हो। चतुर्थी-पंचमी: परिवार में अविवाहित अवस्था में दिवंगत हुए लोगों का तर्पण। अष्टमी: उसी वर्ष दिवंगत हुए पूर्वजों के पिंडदान की परंपरा। मातृ नवमी: माता और परिवार की अन्य महिलाओं के श्राद्ध के लिए विशेष दिन।चतुर्दशी: दुर्घटना, जहर या आग से अकाल मृत्यु पाने वालों का श्राद्ध। सर्वपितृ अमावस्या: जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि याद नहीं है, उनके निमित्त श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किया जाता है।पूर्णिमा को मरने वालों का श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या को करने की परंपरा है।
पितृ पक्ष 2026 का पूरा कैलेंडर
| 26 सितंबर | शनिवार | भाद्रपद पूर्णिमा | पूर्णिमा श्राद्ध |
| 27 सितंबर | रविवार | प्रतिपदा | प्रतिपदा श्राद्ध |
| 28 सितंबर | सोमवार | द्वितीया | द्वितीया श्राद्ध |
| 29 सितंबर | मंगलवार | तृतीया | तृतीया श्राद्ध |
| 30 सितंबर | बुधवार | चतुर्थी | चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध |
| 1 अक्तूबर | गुरुवार | षष्ठी | षष्ठी श्राद्ध |
| 2 अक्तूबर | शुक्रवार | सप्तमी | सप्तमी श्राद्ध |
| 3 अक्तूबर | शनिवार | अष्टमी | अष्टमी श्राद्ध |
| 4 अक्तूबर | रविवार | नवमी | नवमी श्राद्ध |
| 5 अक्तूबर | सोमवार | दशमी | दशमी श्राद्ध |
| 6 अक्तूबर | मंगलवार | एकादशी | एकादशी श्राद्ध |
| 7 अक्तूबर | बुधवार | द्वादशी | द्वादशी श्राद्ध |
| 8 अक्तूबर | गुरुवार | त्रयोदशी | त्रयोदशी श्राद्ध |
| 9 अक्तूबर | शुक्रवार | चतुर्दशी | चतुर्दशी श्राद्ध |
| 10 अक्तूबर | शनिवार | अमावस्या | सर्वपितृ श्राद्ध |
