सरकार के पास धर्म के आधार पर नागरिकता का कोई रिकॉर्ड नहीं
लालकिला पोस्ट डेस्क
सबसे पहले एक तारीख की चर्चा। ये तारीख ख़ास हैं क्योंकि इसी 11 दिसंबर, 2019 को राज्यसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक पर बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया था, कि इस क़ानून में नागरिकता प्रदान करने के प्रावधान हैं. जिसे हटाया नहीं जा रहा है. पिछले पांच वर्षों में 566 से अधिक मुसलमानों को भारतीय नागरिकता दी गई है। बाद के मीडिया साक्षात्कारों में, शाह ने इस संख्या को 600 के करीब बताया था। लेकिन शाह के बयान के तीन महीने बाद और पुरे देश में नागरिकता पर मचे बवाल के बीच संसद में सरकार ने दावा किया कि जिन्हें नागरिकता दी गई है उनके धर्म के आधार पर कोई आंकड़ा सरकार ने जमा ही नहीं किया है। अब कई जानकार ये सवाल उठा रहे हैं कि अब तक दी गई नागरिकता अगर धर्म का ज़िक्र नहीं था, तो अब क्यों धर्म के आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान शुरू किया जा रहा है?
नागरिकता संशोधन क़ानून पर चल रहे विवाद के बीच केंद्र सरकार ने बताया है कि जिन लोगों को देश में नागरिकता दी गई है उनके धर्म का कोई आंकड़ा तैयार नहीं किया गया है। केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि सरकार के पास इन लोगों का धार्मिक आधार पर कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। सरकार ने बताया कि जिनको नागरिकता दी गई है उनका डेटा धर्म के आधार पर तैयार नहीं किया जाता है। सरकार के मुताबिक़ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के क़रीब 19 हज़ार लोगों को 2014 में नागरिकता दी गई थी।
गृह मंत्रालय के मुताबिक़ मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से अब तक कुल 18,999 लोगों को भारतीय नागरिकता दी गई है जिनमें सबसे ज़्यादा बांग्लादेशी शामिल है. सरकार के मुताबिक़ इस दौरान 15000 बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता दी गई है। असल में बांग्लादेश के इतने लोगों को नागरिकता देने के पीछे भूमि सीमा समझौता अहम वजह है।
बँगला देश के जमीनी समझौते के तहत नागरिकता कोछोड भी दिया जाय तो बीते पांच साल में सिर्फ़ 172 बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता मिली है। इसी दौरान 2,935 पाकिस्तानी, 914 अफ़ग़ान, 113 श्रीलंकाई और एक म्यांमार के व्यक्ति को भारतीय नागरिकता दी गई।
